Kabir Das Biography In Hindi – कबीर दास की Inspiring जीवनी

Kabir Das Biography In Hindi - कबीर दास जी की जीवनी

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

नमस्कार दोस्तों, आज मैं Kabir Das Biography In Hindi आपके साथ साझा करने जा रहा हूँ। आशा करता हूँ आपको कबीर दास की जावनी पढ़ के काफी कुछ सीखने को मिलेगी।

Kabir Das Biography In Hindi

आत्मचिंतक और भक्ति काल के महान संत कबीर दास द्वारा कही ये पंक्तियां उस काल मे भी जन चेतना को कितना प्रभावित करती होगी हम समझ सकते है । स्वरोपित और स्वयं उध्दृत जन चेतना के प्रेरक कबीर दास का जन्म एक जुलहे परिवार में हुवा था । उनके जन्म के विषय मे अनेक किवदंतिया प्रचलित है । कोई भी की साक्ष्य पूर्ण रूप से सही तरह प्रतिपादित नही है।

फिर भी जितनी जानकारी मिल पाई है उसके आधार पर कबीर का जन्मस्थान ‘काशी’ को माना जाता है ।ऐसा कहा जाता है कि स्वामी रामानंद के संताप से एक विधवा ब्राह्मणी ने कबीर को जन्म दिया ,तत्पश्चात उन्हें काशी के निकट ‘लहरताल’ में फेंक दिया।

‘नीमा’ और ‘नीरू’ नामक ज़ुल्हे दंपति ने कबीर दास का पालन पोषण किया था। ऐसा कहा जाता है कि वो कबीर दास को लहरताल से उठा के लाये थे। बहुत सारे इतिहासकार और बुद्धिजीवी ये मानते है कि कबीर ईश्वर के भेजे हुवे एक ऐसे दूत थे जिन्होंने भक्तिकालीन (15वी शताब्दि में भक्ति आंदोलन) को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। उन्होंने ‘राम’ नाम का खंडन इस तर्ज पर किया कि कोई उसका चाह कर भी विरोध नही कर पाया।

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जन्म स्थान और शिक्षा दीक्षा

कबीर दास का जन्म काशी में हुवा था। कबीर दास स्वामी रामानंद को अपना गुरु मानते थे । अपनी रचनाओं के माध्यम से  कबीर जी ने अपने जन्म स्थान औए अपने गुरु का बखूबी वर्णन किया है।

‘हम काशी में प्रकट भये है , स्वामी रामानंद चेताये’

एक जुलहा दम्पति द्वारा पालन पोषण किये जाने के पश्चात कबीर ने भरण-पोषण के लिए ज़ुल्हे के ही व्यवसाए को चुना। अपनी जाति को उद्धरित करते हुवे लिखते है 

“जाति जुलाहा नाम कबीरा 

बनि बनि फिरो उदासी” 

कबीर पंथियों द्वारा कहा जाता है कि कबीर  जन्म से मुसलमान थे । स्वामी रामानंद  के सानिध्य में आकर उन्होंने हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया । स्वामी रामानंद और कबीर के विषय मे एक जनश्रुति बड़ी प्रसिद्ध है । कबीर स्वामी जी को अपना गुरु बनाना चाहते थे। उन्होंने स्वामी रामानंद से गुरु बनाने का आग्रह किया जिसे रामानंद ने अस्वीकार कर दिया।  

उस समय स्वामी रामानंद पञ्चगंगा नदी के तट पर स्नान करने जाते थे। कबीर जी एक प्रातःकालीन जाकर  पञ्चगंगा नही के घाट पर जाकर लेट गए । जैसे ही स्वामी जी स्नान करके लौटे उनका पैर कबीर के ऊपर पड़ गया और उनके मुख स निकला “राम-राम ” । कबीर ने इन्हें  शब्दो को दिक्षा-मंत्र मान लिया ।और रामानंद जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। 

यही वो क्षण है जब कबीर राम के इतने करीब आये ,उन्होंने राम को न ही कोई मूर्ति माना  और न उसका आकार माना।  उनके राम श्रेष्ठता के प्रतीक नही थे ,सर्वज्ञानी भी नही थे । अपितु वो एक ऐसे सदर्शी थे जो जनकल्याण के संवाहक थे ,गरीबो के मशीहा थे और मजलूमों की ताकत। कबीर ने निर्गुण भक्ति की आराधना की । उनके लिए भगवान निर्गुण थे।

Kabir Das Short Biography in Hindi

Kabir Das Short Biography in Hindi: शिक्षा-दीक्षा और निजी जीवन 

कबीर पंथियों के अनुसार कबीर पढ़े लिखे नही थे , इन्होंने अपनी सारी रचनाएं मौखिक आधार पर की जिसको उनके शिष्यों ने लिख कर संकलित किया ।  कबीर ने अपने जीवन के हरेक पहलू को अपने दोहों ,चौपाइयों और अपने पाठों के माध्यम से लोगो को बताया । उन्होंने कभी कलाम नही छुवा इसके संदर्भ में लिखते है  

“मसि कागद छुवो नही  ,कलम गही नहि हाथ ” 

कबीर व्यक्तित्व के अत्यंत सरल और सहज थे । कबीर जिस काल मे थे उस वक़्त हिन्दू धर्म पर मुस्लिम समुदाय का कहर था । कबीर ने अपनी रचाने इस तरह से की कि मुस्लिम धर्म के लोग भी उनकी तरफ झुके चले आये।

कबीर ने तो किस मंदिर , मस्जिद और न किसी गुरुद्वारे गए। वो कर्मकांड के अत्यंत खिलाफ थे । उनका मानना था कि कर्मकांड इंसान को उसके मूल से बहुत दूर ले जाता है । कबीर ने अपनी शिक्षाओं का माध्यम अत्यंत सरल और सहज रखा जिससे किसी भी धर्म के लोग आसानी से समझ जाएं।

भाषा-शैली

कबीर ने घूम घूम कर अपनी शिक्षाओं का प्रचार -प्रसार किया । कबीर की भाषा शैली सधुक्कड़ी और पंचमेल थी । कबीर की रचनाओं में लगभग हर तरह के शब्द देखने को मिलते है । इन्होंने कुछ रचनाओं में अवधि, तो कुछ में राजस्थांनी , हरयाणवी, पंजाबी , खड़ी बोली और ब्रज भाषा के शब्दों का उपयोग किया ।

Kabir Das Biography In Hindi – कबीर की रचनायें

कबीर की प्रमुख रचनाएं समाज को आईना दिखाने का काम करती है । उन्होंने समाज मे फैली बुराइयों और कुरीतियों पर अपने दोहों और चौपाइयों के माध्यम से कटु प्रहार किया । उनके  वाणियों का संग्रह धर्मदास द्वारा बीजक नामक ग्रंथ में किया गया है । बीजक के तीन भाग है 

1 साखी

2.सबद  

3.रमैनी

साखी: संस्कृत ‘ साक्षी , शब्द का विकृत रूप है और धर्मोपदेश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अधिकांश साखियां दोहों में लिखी गयी हैं पर उसमें सोरठे का भी प्रयोग मिलता है। कबीर की शिक्षाओं और सिद्धांतों का निरूपण अधिकतर साखी में हुआ है।

सबद गेय पद है जिसमें पूरी तरह संगीतात्मकता विद्यमान है। इनमें उपदेशात्मकता के स्थान पर भावावेश की प्रधानता है ; क्योंकि इनमें कबीर के प्रेम और अंतरंग साधना की अभिव्यक्ति हुई है।

रमैनी चौपाई छंद में लिखी गयी है इनमें कबीर के रहस्यवादी और दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया है।

कबीर की अंतिम यात्रा और उनके राम 

कबीर का अधिकतर जीवन काशी में गुजरा ।काशी को ही उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाई । परंतु जीवन के अंतिम पड़ाव में वो मगहर चले गए । ऐसा माना जाता है कि जो मगहर में अंतिम सांस लेता है उसे स्वर्ग नसीब होता है । यही वजह है कि उन्होंने अपनी अंतिम सांस मगहर में ली ।

एक बार अपनी आत्मनिरीक्षण और आत्मा परीक्षण की  यात्रा में वो कालिंजर गए । वहां वो पिथौरगड़ गए । वहां एक छोटा सा मंदिर था ,जिसके संत रामकृष्ण थे  । वो जिज्ञासा से परिपूर्ण से परिपूर्ण थे परन्तु उनके कुछ प्रश्नों का जवाब नही मिल पाया था । कबीर जी से मुलाकात के पश्चात दोनों संतो में विचार का आदान-प्रदान हुवा । कबीर की कही एक बात रामकृष्ण पर गहरा छाप छोड़ गयी

बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान। करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।’

अथार्त वन से भागा हुवा और बहेलिये द्वारा खोदे गए खड्डे में गिरा हाथी अपनी व्यथा किस्से कहे ।

उन्होंने ये मर्म रामकृष्ण के जिज्ञाषा को शांत करने के लिए कहा । कबीर राम के बडे भक्त थे । उन्होंने पूरे जीवन एक अदॄश्य परंतु विश्वास से परे एक ऐसे राम की भक्ति की जो निर्गुण थे । न तो वो मंदिर में थे और न मस्जिद में ।  वो किसी एक जगह न होकर संसार के कण-कण में विराजमान है । कबीर राम को किसी भी खांचे में बांधे जानें के खिलाफ है । कबीर के राम मानव जीवन और इसके सहअस्तित्व के सिद्धांत पर  आधारित थे ।       

भक्तिकाल के संतो में अगर तुलसीदास के बाद  द अगर किसी का नाम लिया जाता है तो वो संत कबीर ही है । वाराणसी से 200 कि०मी दूर मगहर में उन्होंने अंतिम सांस ली । 1518 के आस पास उनकी मृत्यु हुई । कबीर दास की कब्र मगहर में ही है।  

कबीर दास की समाधि से क़रीब सौ मीटर दूर उसी परिसर में कबीर की मज़ार भी है. मज़ार जहां पर है, ये इलाक़ा आज भी क़ब्रिस्तान है ।. ये इलाक़ा अब पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है लेकिन इसके बाहर कब्रिस्तान ही है जबकि दूसरी ओर श्मशान घाट.”

हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के तौर पर याद किए जाने वाले संत कवि कबीर धार्मिक सामंजस्य और भाई-चारे की जो विरासत छोड़कर गए हैं, उसे इस परिसर में जीवंत रूप में देखा जा सकता है.

परिसर के भीतर ही जहां एक और क़ब्र है, वहीं दूसरी ओर एक मस्जिद और उससे कुछ दूरी पर मंदिर है. यही नहीं, क़रीब एक किमी. की दूरी पर एक गुरुद्वारा भी है जो कि यहां से साफ़ दिखाई पड़ता है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि ये सब आसानी से हो गया. कबीर दास की मृत्यु के बाद उनके पार्थिव शरीर पर अधिकार को लेकर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच संघर्ष की कथाएं भी प्रचलित हैं. जानकारों के मुताबिक, उसी का नतीजा है कि हिन्दुओं ने उनकी समाधि बनाई और मुसलमानों ने क़ब्र.।

कबीर दास जी हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता के रूप में याद किये जाएंगे ।

ये थी कबीर दास जी की जीवनी। आशा करता हूँ आपको Kabir Das Biography In Hindi पढ़ के काफी कुछ सीखने को मिला होगा।

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