Moral Stories in Hindi – चिंतित व्यक्ति कभी विकसित नहीं होता!

Moral Story in Hindi

विश्व में भारत एक नौजवान देश का दर्जा प्राप्त करता है। यही नौजवानों की ऊर्जा कम न हो तो उनके लिए प्रेरणादायक कहानियों (Moral Stories in Hindi) का सहारा लेना उत्तम फैसला होता है। एक प्रगतिशील सृष्टि की रचना युवा वर्ग ही रखता है।

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में अधिकांश जनसंख्या नन्हें नौजवानों की है। भूतकाल से भारत साहित्यिक रूप में बेहद उत्तीर्ण रहा है। उन महान मस्तिष्क द्वारा लिखी गई कई कहानियों का समंदर बूंद बूंद कर भर चुका है और अब आज के बच्चों में प्रेरणा का स्त्रोत बन रहा है। 

नमस्कार! दोस्तों हम Hindi DNA में आपका हृदय से स्वागत करते हैं। आज इस पोस्ट के माध्यम से हम आपके नेत्रों को आपके मन को एक कहानी न्योछावर करने जा रहे हैं। Moral Stories in Hindi की इस श्रेणी में लिखी गई कहानी बेहद प्रचलित हुई हैं परन्तु इन्हें आपके नन्हें शैतानों को समझाने हेतु आसान भाषा में पेश करने की कोशिश करी गई है। 

पेश है Moral Stories in Hindi: चिंतित व्यक्ति विकसित नहीं होता

समय की सुइयों को पीछे घुमाएं और भारत के उस रूप में ले जाएं जब साधुओं की धरती इस देश को कहा जाता था। उस जमाने में एक महान संत हुए थे। जिनके प्रत्येक और निकट के राज्यों में एक या एक से अधिक शिष्यों की मौजूदगी दर्ज थी।

इन्ही शिष्यों में एक थे सदानंद। सदानंद उस साधु के ज्ञान से काफी प्रभावित था एवं साधु भी सदानंद को अपना चहेता छात्र मानते थे। सदानंद ने एक युवा की उम्र तो धारण कर ली थी परन्तु उसका हृदय फिलहाल अभी एक छोटे बच्चे के मुताबिक ही था अर्थात सदानंद भोले व्यक्ति के समानार्थी थे। 

साधु ने सदानंद से कई बार याचना करते हुए कहा कि “सदानंद तुम भी मेरी कुटिया में पधारो, वहाँ मौजूद हर भक्त को सही राह दिखाने का प्रयत्न करो।” परन्तु सदानंद हर वक्त टाल देता, कारण यह था कि सदानंद अपने परिवार से काफी स्नेह करता था। वह मानता था कि उसके जाने के पश्चात उसके बालकों का एवं उसकी अर्धांगनी का ख्याल कौन रखेगा?” इस पर साधु समझाते हुए कहते हैं कि “तुम नकारात्मक विचारों से भरे हुए हो, यह मात्र तुम्हारा वहम है, तुम्हारा परिवार सकुशल रहेगा।”

अगले दिवस जब सदानंद कुटिल पहुंचा और सत्संग में शामिल हुआ तो फिर साधु ने सदानंद को फिर से प्रस्ताव दिया कि वह हमेशा के लिए यहाँ आ जाए एवं ईश्वर को प्राप्त करने हेतु उनकी भक्ति में स्वंय को लीन कर दे। 

सदानंद अब साधु की इच्छा पूर्ण करने के लिए मान गए। अब उन्हें इस बात की चिंता सता रही थी कि वे अपने परिवार को कैसे बताएंगे कि अब वह सन्यासी जीवन व्यतीत करने की इच्छा रखते हैं। इस पर साधु ने उनको एक युक्ति सुझाई। जिसके तहत साधु ने सदानंद को सांस रोकने की कला में निपुण किया। 

सदानंद हर दिन प्रातः उठकर अपने समस्त परिवार के सदस्यों के साथ नदी में स्नान करने जाता था। ऐसे ही एक दिन जब वह अपने परिवार के साथ स्नान करने गया तो सदानंद ने अपनी सांस रोकने वाली कला से जल में सांस रोक लिया।

जिससे उनके परिवार वालो को लगा कि सदानंद नदी में विलीन हो गए। सदानंद के परिवार वालों ने उसे कई घंटों तक खोजने का प्रयास किया तब जाकर वह इस निर्णय पर यकीन करें।

जब पूरा परिवार थककर घर की ओर अपना उदास सा मुख लेकर पहुंच रहे होते हैं, तब रास्ते में साधु के कई शिष्यों से परिवार की भेंट होती है। जब उन सभी को यह मालूम होता है कि सदानंद इस पृथ्वी को छोड़ चुका है तो सभी ने मिलकर यह निर्णय किया कि सदानंद के परिवार वालों का खर्चा वह उठाएंगे। 

दूसरी ओर सदानंद नदी से बाहर आकर अब साधु के आश्रम पहुंच जाता है। अब उसका जीवन ईश्वर के भक्ति को समर्पित कर देता है। 

एक दिन सदानंद की पत्नी उस साधु के आश्रम पहुंच कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहुंचती है, जिसका ज्ञात जैसे ही सदानंद को होता है वह कुटिल में ही कहीं छिप जाता है ताकि वह अपनी पत्नी की बातें भी सुन सके एवं अपनी पत्नी के नजर भी न आए।

साधु:- “पुत्री हमें यह जानकर बेहद दुख हुआ, अपने प्रिय शिष्य की मृत्यु की खबर सुनी तो नैनों से जल बहने लगे। तुम्हारी हालात अब कैसी है ?”

सदानंद की पत्नी:- ” प्रणाम गुरु जी, इनकी पूर्ति कोई मनुष्य नहीं कर सकता है गयरुवर, परन्तु मेरा जीवन अब अच्छी स्थिति पर आ गया है। यह स्थिति पूर्व से भी बेहतर है।”

यह वाक्य जैसे ही साधु के कानों में घुसे वह मुस्कुरा पड़े, जैसे उन्हें इस बारे में पहले से ही मालूम हो।

सदानंद की पत्नी अब साधु के आगे अपने शीश झुकाते हुए आशीर्वाद प्राप्त करती है और वहाँ से प्रस्थान करती है। अपने पत्नी को जाते देखने के बाद सदानंद खुद को साधु के सामने लाता है।

साधु:- “अब तो तुम्हें यकीन हो गया न कि वह तुम्हारे बिना खुश हैं”

सदानंद: “नहीं मुझे अभी भी यकीन नहीं, उन्हें मेरी जरूरत अभी भी है।”

साधु:- “अगर तुम्हें उनकी खुशी का सबूत चाहिए तो तुम स्वयं जाकर पड़ताल करलो ताकि तुम्हें शांति मिले।

साधु से आज्ञा लेकर सदानंद अपने घर, अपने बच्चो एवं अपनी पत्नी पे नजर रखने लगा। सदानंद हर दिन उन पर नजर रखने लगा। उसने देखा कि उसका परिवार हर दिन की तरह सुबह जल्दी उठकर नहाने नदी पहुंच जाते।

खुशी खुशी नहाकर नदी से वापस आ जाते। बच्चे गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने जाते। पत्नी भी अब आत्मनिर्भर हो चुकी थी वह अपने घर में से कुछ पैसों से कभी फल तो कभी सब्जियां खरीदती और उसे अपने कस्बे में बेच आती। 

सदानंद की औरत अब कस्बे में एक उच्चस्तरीय व्यापारी महिला के रूप में खुद को साबित कर रही थी। वह बेहद खुश थी। 

सदानंद यह दृश्य देख बेहद क्रोधित हुआ। उसे यह मानने में हिचक हो रही थी कि एक महिला अपने बुद्धि से घर चला सकती है। सदानंद को अपनी बीवी की खुशी हजम नहीं हो रही थी। सदानंद उसी क्षण अपने गुरु के पास गया और उससे अपनी मुश्किलों का हल निकालने के लिए कहा। 

साधु ने सदानंद के विचारों का विरोध किया। सहजता से साधु ने सदानंद को स्वयं फैसला लेने को कहा। सदानंद ने पूरे कस्बे में यह अफवाह फैला दी कि जो भी सदानंद की बीवी के हाथ से फल या सब्जी लेगा उसकी मृत्यु हो जाएगी।

यह ऐलान होते ही उसकी इच्छा पूर्ण हो गई सभी कस्बा वासियों ने उससे फल सब्जी लेना बंद कर दिया। 2-3 दिन किसी शख्स ने भी उससे फल सब्जी नहीं ली। सदानंद फिर से नजर रखने के लिए अपने घर पहुंचा तो हैरान था। वहाँ अभी भी सब प्रसन्न थे। बच्चे खेलने कूदने में व्यस्त रहते और बीवी भी  कुछ न बिकने के बावजूद वह खुश थी। 

सदानंद ने फैसला किया कि अब वह घर लौट जाएगा। उसने अपने बच्चों के देर रात सोने का इंतजार किया। जैसे ही वह सोते हैं सदानंद घर के दरवाजे को खट खट करता है। सदानंद की बीवी यह ध्वनि सुनकर घबरा जाती है। वह धीमी आवाज में पूछती है “कौन है?”

इस पर सदानंद उतने ही धीमी आवाज में जवाब देता है। “मैं तुम्हारा पति सदानंद, दरवाजा खोलो।” 

पत्नी:- “यह समय मजाक का नहीं मेरे पति को मरे हुए 2 महीने से ऊपर हो गए हैं।”

सदानंद:- “मैं मरा नही था।”

पत्नी:- “नहीं मैं नहीं मानती तुम्हारी बात को, चले जाओ यहाँ से अन्यथा मेरे बच्चे तुमसे डर जाएंगे।”

सदानंद:- “लेकिन मैं भूत नही हूँ, तो मेरे से क्यों डरेंगे।”

पत्नी:- मेरे पति को मरे हुए 2 महीने हो चुके हैं, दो महीने से वह घर की ओर मुड़ा ही नहीं, लेकिन अब आकर कोई कहे कि वह मेरे पति हैं तो वे मात्र उनकी आत्मा ही कह सकती है।”

सदानंद:- “अरे!, भाग्यवान तुम दरवाजा खोलो मैं ही हूँ, मैं तुम्हें फिर से खुश करने आया हूँ, अपने बच्चों के जीवन में फिर खुशियों के रंग भरने आया हूँ।”

पत्नी:- “नहीं मैं स्वंय बेहद अपने बच्चों एवं खुद को प्रसन्न करने में सक्षम हूँ, और अब तक कर भी रही हूँ, कृपया तुम जो भी हो यहाँ से चले जाओ।

सदानंद यह सुनकर वहाँ से दुखी होकर वहाँ से चले जाता है।

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दोस्तों यह Moral Stories in Hindi श्रेणी में लिखी गई कहानी हमें यह बतलाती है कि जीवन किसी के होने या न होने से निर्धारित नहीं होती। हो सकता है वह आप के जीवन मे बेहद महत्व रखता हो, परन्तु महत्व और जरूरी होने में बेहद फर्क है। जैसे इस Moral Stories in Hindi में सदानंद को लगता था कि उसके बिना उसका परिवार खुश नहीं रह पाएगा। परन्तु हुआ इससे विपरीत सदानंद की पत्नी ने अपने हाथ में जिम्मा लिया एवं अपने बच्चों को वह सभी खुशियां प्रदान करी। 

अगर आपको यह Moral Stories in Hindi पसंद आई तो हमें नीचे कमेंट करें, और हमसे संपर्क में रहे। हम ऐसे ही Hindi Kahani से आपको रूबरू करवाते रहेंगे। जिसमें सीख का नया रूप आपको मिलेगा। अगर आपके पास भी कोई कहानी है और आप हमसे साझा करना चाहते हैं तो कृपया हमें भेंजे। हम स्वयं आप से संपर्क करेंगे।

धन्यवाद।

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