Love Story in Hindi – बचपन की याद दिलाने वाली प्रेम कहानी!

नमस्कार! दोस्तों स्वागत है आपका Hindi Kahani की इस प्यार भरी दुनिया में। इस पोस्ट में आज आपको Love Story in Hindi श्रेणी में एक प्यार भरी दास्तां पढ़ने को मिलेगी, जो प्यार का असली मतलब खोजने निकले विशाल के इर्द गिर्द घूमती है।

Love Story in Hindi

Love Story in Hindi श्रेणी की इस कहानी में आपको विशाल एवं प्रिया का प्रेम मिलेगा, उनकी मासूमियत मिलेगी, पर जो नहीं मिल पाएगा वह है इजहार। इश्क का इजहार करना इतना आसान नहीं हो पाता। विशाल के लिए तो कभी भी नहीं। जानिए इनकी अद्धभुत Prem Kahani जो सही गलत को तो नहीं जानते थे लेकिन प्यार को जान गए।

Love Story in Hindi – नादान प्यार

विशाल अपने घर में एक किताब बड़े ध्यान से पढ़ रहा था। शब्द को तोड़ तोड़ कर बोलते हुए उसकी बोली बेहद प्यारी लग रही थी। उसकी बोली की तरह उसकी शक्ल भी बेहद प्यारी थी।

उसने अपनी माँ से पूछा :- “माँ! यह लव क्या होता है?” विशाल के छोटे से मूहँ से यह सवाल उसकी माँ को प्यारा तो लगा ही पर अजीब भी लगा। उसकी माँ ने उसके हाथ से किताब लिया और देखने लगी कि उस किताब में ऐसा क्या लिखा है, जिसके कारण विशाल ने उससे यह सवाल पूछा।

किताब अंग्रेजी में थी जिसके कारण उसकी माँ इसे पढ़ने में असमर्थ थी। लेकिन वह सिर्फ यह शब्द समझ पा रही थी ‘लव’। प्यार विश्व में एक मात्र ऐसा शब्द है जो हर भाषा में मस्तिष्क में उतर जाता है। विशाल की माँ भी अपने स्वर्गीय पति के प्यार में खो गई थी।

उन्होंने अपने पति को एक हादसे में खो दिया था। यह हादसा विशाल के जन्म लेने से पूर्व हुआ था। अब विशाल की माँ वास्तविक जीवन में प्रवेश कर चुकी थी और तुरंत ही उन्होंने विशाल से हैरान भाव में पूछा “यह किताब तुम्हें किसने दी?” 

विशाल ने माँ के हाथ से तुरंत वह किताब ली और कहा-“माँ यह मुझे स्कूल में किसी ने दी थी।” उसे यह मालूम था यह सुनकर उसकी माँ उसे ज्ञान देने में लग जाएगी उससे पहले ही विशाल ने माँ से कहा:- “माँ मैं सो रहा हूँ, कल स्कूल जाना है न! इसीलिए”

“हाँ, ठीक है सो जा, और जिसने भी यह किताब तुम्हें दी है उन्हें वापस कर देना।”

अगले दिन

सूरज की तेज रोशनी के साथ चिड़ियों की चहकने की आवाज पूरे शहर में मंत्रमुग्ध कर रही होती है। विशाल की माँ इस आवाज से जल्द उठकर तैयार हो जाती है। अब विशाल भी उठ जाता है और जाने के लिए तैयार हो जाता है। यह देखकर विशाल की माँ उसे हैरान स्वर में बोलती है:- “तू! कहाँ जाने के लिए तैयार हो रहा है?”

विशाल:- “स्कूल!”

विशाल की माँ:-“आज रहने दे, हमेशा जाएगा तो अच्छा नहीं लगता।”

विशाल एक गरीब परिवार का लड़का था उसकी माँ स्कूल में मजदूरी करती थी। वह इतना नहीं कमा पाती थी कि विशाल को स्कूल भेज सके। विशाल अपनी माँ के साथ मात्र एक लड़की से मिलने के खातिर जाता था।

वह स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसकी मासूमियत, उसकी खूबसूरती सूर्य की तेज रोशनी को भी हरा देती थी। आवाज भी ऐसी थी मानो कोयल से ट्रैनिंग लेकर धरती पर आई हो। वह एक अप्सरा का रूप ही थी।

विशाल की माँ उसके स्कूल जाने के पीछे का राज से अभी भी अवगत नहीं थी। लेकिन उसके जिद्द करने पर उसे साथ में स्कूल ले जाने को तैयार हो गई। लेकिन जाने से पहले यह विशाल के सामने शर्त रखी की वह कहीं भी बिना बताए नहीं जाएगा और स्कूल में इधर उधर नहीं घूमेगा। विशाल यह सब बातें मान गया और माँ के साथ स्कूल चल दिया।

स्कूल में:

स्कूल पहुंचते ही विशाल को स्कूल के भीतर से जन गण मन सुनाई दिया इससे विशाल को यह मालूम होता कि आप सुबह की प्राथना का अंतिम चरण चल रहा है इसके तुरंत बाद ही सब स्कूल के विद्यार्थियों का जमावड़ा अपनी क्लास की ओर मुड़ेगा।

विशाल उस खूबसूरत लड़की प्रिया को देखने की इच्छा लिए उस स्थान पर खड़ा हो गया जहां से सभी स्टूडेंट्स क्लास की ओर मुड़ते थे। लेकिन उसकी छोटी आयु और छोटे कद ने उसे धोखा दे दिया। उसे प्रिया नहीं दिखी जिससे वह इस बात पर चिंतित हो गया कि प्रिया आई है या नहीं।

सुबह न दिखने के कारण विशाल ने यह मान लिया कि उस दिन प्रिया नहीं आई। बचपन की उम्र ऐसी होती है यह हर बात को बेहद जल्द स्वीकार कर लेती है। लेकिन विशाल ने अपनी सोच को मान्यता देने से पहले एक आस लिए अपनी माँ से परमिशन लिया कि क्या वह प्लेग्राउंड में जा सकता है, जहाँ वह एक कोने में बैठ जाएगा। माँ के हामी भरने के बाद विशाल ग्राउंड में चला गया, समय अब लंच ब्रेक का था। 

लंच ब्रेक में प्रिया हर दिन उसी जगह पर आती है जहाँ आज विशाल पहले से ही बैठा था। विशाल भी प्रिया को सबसे पहले यहीं मुलाकात हुई थी जो कि पिछले दिन की ही बात थी। प्रिया ने ही उसे अपनी किताब पढ़ने को दी थी और थोड़ा बहुत पढ़ना भी सिखाया। प्रिया ने विशाल को देखते ही पूछा :- “अरे!, तू इधर?” 

विशाल ने नजर नीचे झुकाए हुए कहा “मैं आपकी किताब लौटाने आया था, आपको भी पढ़ना होगा न” यह सुनते ही प्रिया मुस्कुराने लग गई और बताया कि यह किताब उस के पांचवी क्लास की है लेकिन अब वो 7th में है। प्रिया ने विशाल की तरफ देखते हुए हैरान स्वर में यह भी पूछा कि आखिर विशाल ने स्कूल के कपडे क्यो नहीं पहने जो उसने एक दिन पहले पहने थे। 

विशाल ने बताया उसे वह कपड़े किसी ने दान किये थे। यह सुनकर प्रिया के चहरे की हवाइयाँ मानो उड़ सी गई। प्रिया ने विशाल से पूछा:- “तो तुम स्कूल नहीं जाते?” विशाल ने इस सवाल का जवाब मात्र एक शब्द में दिया, इस बार यह जवाब उसने होठों को खींचते हुए एक प्यारी सी मुस्कान में ‘न’ कहा।

प्रिया को उस पर तरस आने लगा था। परन्तु विशाल को अपनी माँ की एक बात याद थी कि कभी भी किसी व्यक्ति को खुद पर तरस न खाने दो। क्योंकि तरस एक ऐसा भाव है जो व्यक्ति को असहाय एवं कमजोर महसूस कराता है।

विशाल की माँ ने उसे हमेशा मजबूत बनने की सीख दी है। विशाल ने प्रिया के भाव को बदलते देख अपने पतली शर्मीली आवाज में पूछा “क्या आप मुझे यह किताब पढ़ना सिखाएंगी?” प्रिया उसके सवाल को समझ नहीं पाई लेकिन ‘हां’ में सर हिला दिया।

प्रिया ने फिलहाल उसे टालने के लिए कहा कि अभी तो लंच ब्रेक खत्म हो रहा है, तो वह कल से शुरू करेगी। इस वाक्य के बाद प्रिया का ध्यान हर वक्त विशाल पर ही रहता। विशाल तो बचपन मे उसे पसंद करने की नादानी कर ही चुका था, जिसे वह अपनी पसंद समझ रहा था उसे ही आसान भाषा में लव कहा जाता है। 

दिन बीतते चला गया और हर दिन प्रिया लंच ब्रेक में ग्राउंड पहुंचती और विशाल को हिंदी और अंग्रेजी भाषा सिखाती। दोनों की दोस्ती काफी बढ़ चुकी थी और उस दोस्ती का शोर काफी दूर तक पहुंच गया था।

सभी स्कूल में यह चर्चा आम थी कि प्रिया लंच ब्रेक में किसी विशाल नाम के लड़के के साथ बैठती है। दोनों कई बार तो लंच ब्रेक के बाद तक भी साथ रहते। स्कूल के अध्यापकों ने विशाल की माँ से विशाल को समझाने को कहा और वही संदेश विशाल की माँ ने विशाल को कहा।

जब प्यार की पतंग आसमान में उड़ रही होती है तो उसे नीचे लाने वाले कई होते हैं। लेकिन विशाल ने समाज की शिक्षा किसी से नहीं ली थी उसने सिर्फ भाषा का ज्ञान प्राप्त किया। उसे यह नहीं मालूम क्या सही क्या गलत।

लेकिन उसकी माँ ने जब यह कहा कि तुम प्रिया को भूल जाओ इसी में प्रिया और तुम्हारी भलाई है। उसने यह तो नहीं सोचा उसके लिए क्या भला है लेकिन अपनी माँ को समझते हुए। उस ने आखिर में अपनी भाषा से जो उसने जाना उसको हमेशा के लिए उसी भाषा में अलविदा कह दिया। 

“प्रिया,

यह मेरा पहला और शायद आखिरी पत्र है, मैं यह नहीं जानता कि मैं तुमसे अब मिल पाऊंगा या नहीं और तुम्हारे मुस्कराहट से भरपूर चहरे को फिर से अपनी इन आँखों से देख पाऊंगा या नहीं।

लेकिन शायद खुदा की यही ख्वाहिश रही होगी की मैं अब तुमसे दूर चला जाऊं जैसे एक अध्यापक अपनी पूर्ण शिक्षा लेकर अपने अध्यापक से दूर अपने जीवन में आगे निकल जाता है। लेकिन मैं अपने भगवान से हमेशा इस बात का शुक्रिया करूंगा कि उन्होंने मुझे दुनिया की सबसे अच्छी टीचर दिया। आपका तह दिल से शुक्रिया। माफ करना अगर मेरी लेखन में आपको गलती दिखे अभी सीख ही रहा हूँ।” 

विशाल ने यह लेटर लिखा पर प्रिया तक पहुंचाने की हिम्मत नहीं हो पाई क्योंकि यह लेटर पहुंचता प्रिया के पास तो वह भी समझ जाती की विशाल उससे प्रेम करने लगा है परन्तु वह यह कहने में हिचक रहा था।

ऊंच नीच का भाव उसमें जन्म ले चुका था। वह खुद को नीच मानने लगा था। वह प्रिया को खुश नहीं रख पाएगा ऐसा वह मान चुका था। प्यार अक्सर इस दुविधा में लाकर खड़ा कर ही देता है। जब ऊंच नीच के भाव, धन की आवश्यकता का भेद स्वंय पर हावी होने लगता है।

अतः यह उम्मीद है कि आपको Love Story in Hindi श्रेणी में लिखी गई यह Prem Kahani पसंद आई हो। ऐसे ही अन्य Hindi Kahani को पढ़ने के लिए हमारे साथ जुड़े रहें।

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धन्यवाद।

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